Mirza Ghalib Ki Shayari -मिर्ज़ा ग़ालिब की [हिंदी शायरी ]

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Mirza Ghalib

Mirza Ghalib Ki Shayari-बेहतरीन हिंदी शायरी के बादशाह – मिर्ज़ा ग़ालिब 

Mirza Ghalib की जबरजस्त शायरी collection हिंदी मे । शायरी और ग़ज़ल की अनमोल संग्रह। mirza ghalib’s Best Shayari Collection- Love , Sad, Romantic हिंदी शायरी। 

Mirza Ghalib Ki Shayari- The Legend Of Urdu Shayari Ghazal 

ज़रा कर जोर सीने पर की तीर -ऐ-पुरसितम् निकले जो 

वो निकले तो दिल निकले , जो दिल निकले तो दम निकले

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Mirza Ghalib-सनम shayari 

खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम 

कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले

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Mirza Ghalib – दुआ हिंदी शायरी 

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा 

नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख

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Ghalib मोहब्बत शायरी हिन्दी मे 

मोहब्बत मैं नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का 

उसी को देख कर जीते है जिस काफिर पे दम निकले

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Mirza Ghalib-याद हिन्दी शायरी 

लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”

हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है

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थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े  Ghalib 

थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ,

देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

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दिल दिया जान के क्यों उसको वफादार , असद -मिर्ज़ा ग़ालिब 

दिल दिया जान के क्यों उसको वफादार , असद 

ग़लती की के जो काफिर को मुस्लमान समझा

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इस नज़ाकत का बुरा हो , वो भले हैं तो क्या – Mirza Ghalib 

इस नज़ाकत का बुरा हो , वो भले हैं तो क्या 

हाथ आएँ तो उन्हें हाथ लगाए न बने 

कह सके कौन के यह जलवागरी किस की है 

पर्दा छोड़ा है वो उस ने के उठाये न बने

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लाज़िम था के देखे मेरा रास्ता कोई दिन और-उस्ताद mirza ghalib उर्दू शायरी 

लाज़िम था के देखे मेरा रास्ता कोई दिन और

तनहा गए क्यों , अब रहो तनहा कोई दिन और

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कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब – Mirza Ghalib 

कितने शिरीन हैं तेरे लब के रक़ीब 

गालियां खा के बेमज़ा न हुआ 

कुछ तो पढ़िए की लोग कहते हैं 

आज ‘ग़ालिब ‘ गजलसारा न हुआ

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इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही 

इश्क़ मुझको नहीं वेहशत ही सही 

मेरी वेहशत तेरी शोहरत ही सही 

कटा कीजिए न तालुक हम से 

कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

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दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई 

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई 

दोनों को एक अदा में रजामंद कर गई

मारा ज़माने ने ‘ग़ालिब’ तुम को 

वो वलवले कहाँ , वो जवानी किधर गई

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लाग् हो तो उसको हम समझे लगाव 

लाग् हो तो उसको हम समझे लगाव 

जब न हो कुछ भी , तो धोखा खायें क्या

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हो लिए क्यों नामाबर के साथ -साथ 

हो लिए क्यों नामाबर के साथ -साथ 

या रब ! अपने खत को हम पहुँचायें क्या

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उल्फ़त पैदा हुई है , कहते हैं , हर दर्द की दवा 

उल्फ़त पैदा हुई है , कहते हैं , हर दर्द की दवा 

यूं हो हो तो चेहरा -ऐ -गम उल्फ़त ही क्यों न हो .

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mirza ghalib shayari in hindi

“ग़ालिब ” बुरा न मान जो वैज बुरा कहे 

ऐसा भी कोई है के सब अच्छा कहे जिसे

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mirza ghalib poetry

नादान हो जो कहते हो क्यों जीते हैं “ग़ालिब “

किस्मत मैं है मरने की तमन्ना कोई दिन और

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mirza ghalib quotes

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की किस्मत ग़ालिब 

जिस की किस्मत में हो आशिक़ का गरेबां होना

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mirza ghalib poems

आया है मुझे बेकशी इश्क़ पे रोना ग़ालिब 

किस का घर जलाएगा सैलाब भला मेरे बाद

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mirza ghalib ghazal

गम -ऐ -हस्ती का असद किस से हो जूझ मर्ज इलाज 

शमा हर रंग मैं जलती है सहर होने तक ..

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mirza ghalib sher

ग़ालिब ‘ हमें न छेड़ की फिर जोश -ऐ -अश्क से 

बैठे हैं हम तहय्या -ऐ -तूफ़ान किये हुए

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ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब ही है ग़ालिब 

ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब ही है ग़ालिब 

अक्सर वहीँ से गुज़रता है जहाँ रास्ता नहीं होता

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कोई , दिन , गैर  ज़िंदगानी और है – ग़ालिब ग़ज़ल 

कोई , दिन , गैर  ज़िंदगानी और है 

अपने जी में  हमने ठानी और है 

आतशे – दोज़ख में , यह गर्मी कहाँ ,

सोज़े -गुम्हा -ऐ -निहनी और है 

बारहन उनकी देखी हैं रंजिशें ,

पर कुछ अबके सिरगिरांनी और है 

दे के खत , मुहँ देखता है नामाबर ,

कुछ तो पैगामे जुबानी और है 

हो चुकी ‘ग़ालिब’, बलायें सब  तमाम ,

एक मरगे -नागहानी और है 

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पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है 

पूछते हैं वो की ‘ग़ालिब ‘ कौन है ?

कोई बतलाओ की हम बतलायें क्या

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करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला – Ghalib 

करने गए थे उस से तग़ाफ़ुल का हम गिला 

बस एक ही निगाह की बस ख़ाक हो गए

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“ग़ालिब” छूटी शराब पर अब भी कभी कभी 

“ग़ालिब” छूटी शराब पर अब भी कभी कभी ,

पीता हूँ रोज़ -ऐ -अबरो शब -ऐ -महताब में

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रही न ताक़त -ऐ -गुफ्तार और अगर हो भी , ग़ालिब 

Read More Shayari….

रही न ताक़त -ऐ -गुफ्तार और अगर हो भी ,

तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है ..

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बहुत सही गम -ऐ -गति शराब कम क्या है  Mirza Ghalib 

बहुत सही गम -ऐ -गति शराब कम क्या है 

गुलाम -ऐ-साक़ी -ऐ -कौसर हूँ मुझको गम क्या है 

तुम्हारी तर्ज़ -ओ -रवीश जानते हैं हम क्या है 

रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है 

सुख में खमा -ऐ -ग़ालिब की आतशफशनि 

यकीन है हमको भी लेकिन अब उस में दम क्या है

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रात है ,सनाटा है , वहां कोई न होगा, ग़ालिब

रात है ,सनाटा है , वहां कोई न होगा, ग़ालिब

चलो उन के दरो -ओ -दीवार चूम के आते हैं

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तेरे हुस्न को परदे की ज़रुरत नहीं है ग़ालिब 

तेरे हुस्न को परदे की ज़रुरत नहीं है ग़ालिब 

कौन होश में रहता है तुझे देखने के बाद

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नुक्ता चीन है , Ghazal Of Mirza Ghalib 

नुक्ता चीन है , गम -ऐ -दिल उस को सुनाये न बने

क्या बने बात , जहाँ बात बनाये न बने

मैं बुलाता तो हूँ उस को , मगर ऐ जज़्बा -ऐ -दिल 

उस पे बन जाये कुछ ऐसी , के बिन आये न बने

खेल समझा है , कहीं छोड़ न दे , भूल न जाये 

काश ! यूँ भी हो के बिन मेरे सताए न बने

खेल समझा है , कहीं छोड़ न दे , भूल न जाये 

काश ! यूँ भी हो के बिन मेरे सताए न बने

ग़ैर फिरता है लिए यूँ तेरे खत को कह अगर 

कोई पूछे के ये क्या है , तो छुपाये न बने

इस नज़ाकत का बुरा हो , वो भले हैं , तो किया 

हाथ आएं , तो उन्हें हाथ लगाये न बने

कह सकेगा कौन , ये जलवा गारी किस की है 

पर्दा छोड़ा है वो उस ने के उठाये न बने

मौत की रह न देखूं ? के बिन आये न रहे 

तुम को चाहूँ ? के न आओ , तो बुलाये न बने

इश्क़ पर ज़ोर नहीं , है ये वो आतिश ग़ालिब 

के लगाये न लगे , और बुझाए न बने

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वफ़ा के ज़िक्र में – ग़ालिब की ग़ज़ल 

वफ़ा के ज़िक्र में ग़ालिब मुझे गुमाँ हुआ 

वो दर्द इश्क़ वफाओं को खो चूका होगा ,

जो मेरे साथ मोहब्बत में हद -ऐ -जूनून तक था 

वो खुद को वक़्त के पानी से धो चूका होगा ,

मेरी आवाज़ को जो साज़ कहा करता था 

मेरी आहोँ को याद कर के सो चूका होगा ,

वो मेरा प्यार , तलब और मेरा चैन -ओ -क़रार 

जफ़ा की हद में ज़माने का हो चूका होगा ,

 

तुम उसकी राह न देखो वो ग़ैर था साक़ी 

भुला दो उसको वो ग़ैरों का हो चूका होगा !

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निकलना खुद से आदम का सुनते आये हैं लकिन

निकलना खुद से आदम का सुनते आये हैं लकिन

बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले

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उग रहा है दर-ओ -दीवार पे सब्ज़ा “ग़ालिब “

उग रहा है दर-ओ -दीवार पे सब्ज़ा “ग़ालिब “

हम बयाबान में हैं और घर में बहार आई है ..