उसने वफ़ा से जब – Shayari

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उसने वफ़ा से जब

उसने वफ़ा से जब कभी इन्कार कर दिया

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उसने वफ़ा से जब कभी इन्कार कर दिया
मेरी अना ने मुझको तलबगार कर दिया

मारा है जिस हिसाब से कमबख़्त वक़्त ने
इस मुफलिसी ने शक्ल को अख़बार कर दिया

पैदा हुए थे जब कभी इतने बुरे न थे
लेकिन गुज़रते वक़्त ने हुशियार कर दिया

किस-किस के द्वारपर गए कासा लिए हुए
कुछ मांगने से क़ब्ल ही इनकार कर दिया

उससे मिला तो यूं लगा कुछ भी हुआ न हो
रुख़सत हुआ तो किस क़दर बेज़ार कर दिया

जितनी जिसे मुराद थी वो उतना पा गया
हमने तो अपने आप को बाज़ार कर दिया

उसने वफ़ा से जब

आँखों में देख कर वो दिल की हकीकत जानने लगे।
उनसे कोई रिश्ता भी नहीं फिर भी अपना मानने लगे।
बन कर हमदर्द कुछ ऐसे उन्होंने हाथ थामा मेरा।
कि हम खुदा से दर्द की दुआ मांगने लगे।


1.बेपनाह मोहब्बत का एक ही उसूल है,
मिले या ना मिले तू हर हाल मेँ कबूल है !!
2. हिसाब अपनी मोहब्बत का मै क्या दूँ
तुम अपनी हिचकियो को बस गिनते रहना
3.तुम दूर हो या पास फर्क किसे पड़ता है,
तू जहां भी रहे तेरा दिल तो यहीं रहता है..!!
4. महफ़िल में कई शायर है तो सुनाओ,
हमे वो शायरी जो दिल के आर पार हो जाये।
5. किसे हमदर्द कहें अपना जमाने में…
सबने अपने मतलब का नकाब ओढ रखा है…!!

पीने पिलाने की क्या बात करते हो,
कभी हम भी पिया करते थे,
जितनी तुम जाम में लिए बैठे हो,
उतनी हम पैमाने में छोड़ दिया करते थे!!


गम के तूफानों में डूबा, इश्क का है साहिल कहां
वो तो है सागर सा गहरा, मैं उसके काबिल कहां

खेलता रहता हूं अक्सर ख्वाहिश के खिलौनों से
टूटता है जब खिलौना, जोड़ना फिर हासिल कहां

अपना दर्द किससे कहे वो, बहुत परेशां रहता है
शहर की भीड़ में सुननेवाला वैसा कोई दिल कहां

दुनिया में थोड़ा मर जाऊं, थोड़ी सांसे चलती रहे
मौत भी दे जो आधी अधूरी, है ऐसा कातिल कहां